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"गुरु" कौन हो सकते है ???

"गुरु" कौन हो सकते है ???

नैतिकता से पूरीपूर्ण चरित्र ,
निस्वार्थ भाव एवं निसश्त्रधारी,
आचरण सदाचार से भरपूर,
सभी के प्रति करुणा एवं प्रेम,
सृष्ठी के प्रति अंहिसावादी एवं मैत्री,
प्रघ्यावान/ग्यानी एवं कल्याणकारी,
निसर्गवादी एवं वास्तववादी तत्व,
न्यायवादी तथा समताधिष्ठीत,
स्वतंत्रता प्रिय,

उक्त तत्व जिनमें मौजुद होते है वही महानत्म "गुरु" के उपाधी के लिए पात्र होते है.
नामके गुरू और कर्म चोरी का, ऐसे गुरू किस काम के ??
आज हमारे देश में ऐसे झुट के साथ लुट करने वाले गुरु कुछ कम नही है. शहर, गाँव तथा गली- मोहल्लें में ऐसे पाखंडी लोग गुरु के नामसे अपने दुकान खोले बैठे है

आज कल किसी भी व्यक्ति को अनैसर्गिक रुप से प्रकट कर उसे "गुरु" कहकर उनके नामसे नासमज एवं अग्यानी लोगों को श्रध्दा के नामसे लुटने के लिए दुकानरुपी प्रार्थना स्थल बनाए गए है और वहाँ पर झुट के संग आम लोंगो की लुट हो रही है .

शिक्षक को भी गुरु के नजरीएं से देखा जाता है और समाज के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका बोती है .परंतु क्या आज के शिक्षक "गुरु" नामक उपाधी के लिए पात्र है ??
क्योंकि आज इन शिक्षकों ने शिक्षा का वन टाईम इनवेस्टमेन्ट और लाईफ टाईम प्राफिट नामक स्कुल और कोचिंग क्लासेस का खुलेआम धंदा खोल के बैठे है.

उनका स्लोगन है "जो पैसा देगा उसको ही ग्यान मिलेगा "

तो गरीब और निर्धन तथा पिछडे लोगों को "दर्जायुक्त शिक्षा " से वचित रखा जा रहा है. यह अन्याय नही है क्या?? तो फिर ऐसे लोग "गुरु" कैसे हो सकते है ??

आषाढ माह के पुनम के दिन ही सिध्दार्थ से बुध्द बने तथागत ने सृष्ठी के सत्य ग्यान को अपने पाँच साथियों को अवगत करायाँ. इस तरह एक महानत्म गुरु ने अपने पाँच शिष्यों को पहला ग्यानरुपी धम्मप्रवचन दिया. इसलिए इस दिन को "गुरुपौर्णिमा" कहा जाता है.

परंतु इस देश के मनुवादी लुटेरोंने तथागत बुध्द के इस महत्वपूर्ण पौर्णिमा का महत्व कम करने तथा अपने काल्पनिक अनैतिक पात्रों को जनता के दिमाग में प्रस्थापित करने हेतु इस पौर्णिमा को चुरा लिया.

लेकिन वे जानते नही है की, सत्य नामक सुरज के रोशनी को कोई भी चुपा नही सकता है .

सृष्ठी के कल्याण हेतु तथागत बुध्द ने आज ही के दिन ढाई हजार वर्षपूर्व पहला धम्मदेशना दी थी. इसलिए आज का दिन " धम्मदीन" के तहत मनाएँ और इस कल्याणकारी धम्म को हमें अवगत कराने वाले , "जगत वंदनिय , जगतगुरू , शाक्यमुनी, सम्यक संबुध्द" का स्मरण कर उन्हें अभिवादन करें .

तथागत बुध्द, संत कबिर, महात्मा फुले, सावित्रीमाई फुले, अाई रमाई, गाडगे महाराज, शाहु महाराज व आंतरराष्ट्रीय मानवीय मुल्याें के मानक बाबासाहेब डा अम्बेडकरजी हमारे "गुरु" होने चाहिए . तभी हम समस्त भारतीय समाज को यहाँ के धर्म संस्कृति रुपी शोषणकारी व्यवस्था से बाहर निकाल सकते है .

गुरु पौर्णिमा एवं धम्मदीन की बहुत सारी हार्दिक शुभकामनाएँ .

हमे तथागत के मानवतावादी एवं कल्याणकारी धम्म से दीक्षित कर हमें मानव की नई पहचान प्रदान करने वाले एवं जन्म देनेवाले मेरे गुरू महामानव युगप्रवर्तक बाबासाहेब अम्बेडकरजी को कोटी-कोटी प्रणाम.

समताधिष्ठीत भारत, रिपब्लिक भारत.
जय भीम, जय भारत.
जेपी.
समता सैनिक दल, पुना .

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